SHORT MOTIVATIONAL STORY
मैं आपको आज एक और कहानी बताने जा रहा हूँ। ये लगभग 1970 की बात है एक भारतीय फुटवियर कंपनी जो इंडिया में तो बहुत अच्छा कर रही थी लेकिन अब उसका मन एक ग्लोबल कंपनी बनने का था। ये कहानी उस कंपनी में काम कर रहे सेल्स टीम के दो मेंबर्स की है। कहानी के लिए उनके नाम उम्मीद और अँधेरा रख लेते है।
उम्मीद और अँधेरा दोनों को ये जॉब कॉलेज प्लेसमेंट से मिली थी और दोनों ही मिडिल क्लास से ताल्लुक रखते थे। दोनों ही एक ही शहर के रहने वाले थे और दोनों एक ही कॉलेज से पढ़े थे लेकिन अगर दोनों में कोई फर्क था तो वो सोच का था दोनों अपने अपने व्यवहार का फर्क था। उम्मीद हर चीज़ की हमेशा अच्छी और सकारात्मक पहलू को देखा करता था वो सभी कामो में अपना अच्छा खोज लेता था लेकिन अँधेरा को कुछ अच्छा नहीं लगता था वो नकारात्मक हो गया था मन में रंजिश हो गयी थी वो बहुत कुछ पाना चाहता था और बहुत जल्दी पाना चाहता था। जिंदगी उसकी रफ़्तार से न चली जिसके कारण उसे अपने चारो तरफ न उम्मीदी ही नज़र आती थी और वो निराश हो गया था। दोनों ही अपनी जॉब में ठीक काम कर रहे थे।
फिर एक दिन बॉस ने दोनों को अपने केबिन में बुलाया और बोला- तुम दोनों को जानकर खुशी होगी कि हमारी कंपनी इंटरनेशनल हो गयी है। कंपनी ने तुम दोनों को सेलेक्ट किया है कि तुम नई सीमा में जाकर रिपोर्ट तैयार करो कि मार्किट में हाल क्या है ? बॉस ने जोश के साथ पूछा - क्या तुम दोनों तैयार हो ? इस समय उम्मीद के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान थी शुक्रगुज़ार था वो कि इस मिशन के लिए उसे ही चुना गया जबकि कंपनी में ओर लोग भी उनसे अधिक काबिल थे पुराने थे अनुभवी थे। उसके मन में इस तरह की बाते थी कि इतने लोगो को छोड़कर बॉस ने मुझे ही चुना है यार, कुछ तो देखा होगा बॉस ने मुझमे।
वही दूसरी ओर अँधेरे के मन में चल रहा था कि मुझे पता था कि बॉस मुझसे शुरु से खुन्नस खाता है और जगह भी क्या चुनी है इंटरनेशनल जाने की अफ्रीका जहा धूल मिटटी गरीबी बस ये ही सब है और फिर मुझे ही चुना वह जाने के लिए। फिर कुछ दिन बाद ये दोनों निजिरिया के लिए निकल पड़े। इस समय एक पूरा खुश होकर निकला और दूसरा वही रंजिसे, शिकायते लेकर निकला। दोनों को वहा जाकर लगभग 12 दिनों के बाद कंपनी को रिपोर्ट टेलीग्राम करनी थी। उन्हें अपना बात रखनी थी कि उनको क्या लगता है कैसे मार्किट है वह कंपनी के फुटवियर लॉन्च किये जाये या नहीं ? वहा कुछ स्कोप है भी या नहीं।
फिर कुछ दिन के बाद दोनों ने अपने टेलीग्राम कंपनी को भेजे और दोनों के टेलीग्राम कुछ इस प्रकार थे अँधेरे ने लिखा कि ये यात्रा बिलकुल पैसे और समय की बर्बादी है। कंपनी पूरी तरह फ़ैल हो जाएगी अगर वो यहाँ लॉन्च करती है क्योकि यहाँ कोई जूते पहनता ही नहीं है। लेकिन दुसरी ओर उम्मीद ने लिखा कि हमारी कंपनी यहाँ पूरी तरह कामयाब होगी अगर हम यह प्रोडक्ट्स लॉन्च करते है ये एक महान अवसर है क्योकि यहाँ कोई जूते पहनता ही नहीं है। हम पुरे देश को जुते बेच सकते है और सबसे बड़ी बात है यहा हमारा कोई कॉम्पिटिशन ही नहीं है।
अब इन दोनों के वापस इण्डिया आने पर उम्मीद को इस नए प्रोजेक्ट का हेड बनाया गया। उसे बड़ा प्रमोशन एंड सैलरी बढ़ी और नई जगह जाने का सारा खर्च मिला। जिससे उम्मीद और खुश था क्योकि अब उसे नए संभावनाएं मिली और दूसरी तरफ अँधेरा अपनी पुरानी जॉब में अपनी रंजिशों और रोने के साथ फिर वही पने पुराने रुटीन रह गया।
दोस्तों आप देखिये एक की जिंदगी वहीं की वहीं अटकी तह गयी लेकिन दूसरे की जिंदगी पूरी तरह से बदल गयी। दोनों एक ही स्थिति से समान संसाधन के साथ समान अवसर से गुज़रे लेकिन फिर इतना बड़ा अंतर क्यों हुआ।? एक वही रह गया और एक बहुत आगे निकल गया। अंतर सिर्फ एक चीज़ का था वो था उनकी सोच का, उनके सोचने के तरिके का।
मैंने कहीं पढ़ा है कि-
सीढ़ियां तो वही रहती है लेकिन किसी के लिए ऊपर जाती है और किसी के लिए वही सीढिया निचे आती है। अब आप देखिये कि आप अपना जीवन कैसी सोच लेकर जी रहे है ? सोचिए सोचिये सोचिये।
Short Motivational Story | Hindi inspirational story by Simerjeet Singh
Reviewed by SHUBHAM PAL
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12:11:00 pm
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